Wednesday, October 28, 2015

लक्ष्य के सापेक्ष मूल्यांकन 

                                    - नवनीत सिंह*

प्रत्येक व्यक्ति जीवन में सफलता हासिल करना चाहता है । किसी उद्देश्य को पूरा करना भी सफलता का परिचायक है । सरल शब्दों में सफलता का आशय लक्ष्य को प्राप्त करना है । कोई भी लक्ष्य निर्धारित करने से पहले लक्ष्य के सापेक्ष अपना मूल्यांकन करना जरूरी है । अगर आप स्वयं को लक्ष्यानुरूप पाते हैं तो उस दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं। ऐसा करने से यह महसूस होगा कि लक्ष्य के लिए अपेक्षित है या नहीं । लक्ष्य निर्धारित करने के बावजूद इसे प्राप्त करने के लिए स्व -प्रतिबद्धता अति महत्वपूर्ण है साथ ही साथ समयबद्ध कार्ययोजना भी आवश्यक है । 

सफलता को इच्छा एवं प्रयासों का समन्वय बताया गया है अर्थात  व्यक्ति का लक्ष्य है जिसे वह प्राप्त करना चाहता है । मनुष्य की कल्पना की उड़ान असीमित है । अतः जो भी लक्ष्य निर्धारित करें वह वास्तविक एवं व्यवहारिक हो और जीवन में लक्ष्य की सफलता इस तथ्य की भविष्य में पुष्टि करेंगे । ये भी ध्यान रखना चाहिए कि लक्ष्य स्वयं की प्रकृति के अनुकूल हो, यह स्व -ज्ञान का भी स्वतः प्रमाण है । सफलता प्राप्ति का सबसे उत्तम माध्यम आत्मविश्वास है , नकारात्मक विचार ऐसी बाधा है जो संभवतः न सिर्फ लक्ष्य को असफल बल्कि स्व -मूल्यांकन की प्रक्रिया को भी ध्वस्त कर सकती है ।  जरूरी यह है कि आपके प्रयासों और लक्ष्य के बीच एक समन्वय होना चाहिए और यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप व्यवस्थित ढंग से कार्य करने को कितना महत्व देते हैं । क्रोध ,आलस्य ,अनावश्यक तनाव जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ दूर हैं तो आप अच्छे ढंग से कार्य कर सकते हैं । मित्रों ,परिवार के सदस्यों तथा शिक्षकों आदि के साथ अच्छा ताल-मेल होना चाहिए ताकि आवश्यकतानुसार उनका सहयोग मिल सके । समय का सही ढंग से उपयोग करना सफलता के लिए काफी महत्वपूर्ण है । समय का सही एवं रचनात्मक उपयोग सफलता की गारण्टी है । विश्राम एवं मनोरंजन भी महत्वपूर्ण है ताकि आप स्वयं में शारीरिक एवं मानसिक स्फूर्ति का अनुभव करें । 

प्रायः सफलता का मार्ग लम्बा और कठिनाइयों से भरा होता है लेकिन ये याद रखना चाहिये कि एक सफलता ही दूसरी सफलता के लिए आपका मार्ग प्रशस्त करेगी तथा समाज में नयी पहचान दिलायेगी । 

अतः "उठो जागो और तब तक मत रुको , जब तक लक्ष्य की प्राप्ति ना हो जाये " (स्वामी विवेकानंद }

*बी. ए. (प्रथम वर्ष )
हरिश्चंद्र पी. जी. कॉलेज ।

Wednesday, October 21, 2015

मेरे दिल का कुछ राज़ ……

                                   -आलोक रंजन *


हम दिल में राज़ छुपाये बैठे हैं ,
कुछ उलझे से हैं ,कुछ सुलझे से हैं ।

क्या कहते सागर की ये लहरें ,
कहाँ रहते ,सूरज की ये रोशनी ;
ये तारे इतने दूर हैं क्यूँ ,
क्या करती चाँद की ये चांदनी

ये हवा क्यूँ बहती है सहमी -सहमी
कुछ उलझे से हैं ,कुछ सुलझे से हैं।

हम उनसे यूँ ही करते हैं प्यार ,
करते रहे और करते गये
एक राह पे चलते रहे साथ -साथ
कि ....  अचानक वो हमसे बिछड़ गये ;

अबतक इंतज़ार करता हूँ क्यूँ ,उसी मोड़ पे ;
कुछ उलझे से हैं ,कुछ सुलझे से हैं।

हम दिल में राज़ छुपाये बैठे हैं ,
कुछ उलझे से हैं ,कुछ सुलझे से हैं ।

*हरिश्चंद्र पी.जी.कॉलेज ।

 शिक्षा व्यवस्था :सियासी जुमलेबाजी या उन्नति का शब्दकोश 

                                                                                                                -अनुराधा प्रजापति *
यूँ तो भारत अपनी संस्कृति ,साहित्य और आध्यात्मिक दर्शन को लेकर दुनिया भर में मशहूर है । दुनिया का सबसे बड़ा संविधान और अब जल्द ही सबसे अधिक जनसँख्या वाला देश भी जिसमे आधी से अधिक आबादी युवाओं की है । उत्तम शिक्षा ही देश और लोगों के विकास के लिए एकमात्र उचित और प्रभावशाली माध्यम है । दरअसल ,संवैधानिक पदों पर आसीन जन नायक और नायिकाओं पर न केवल शिक्षा व्यवस्था को  दुरुस्त बल्कि अद्यतन भी करने की जिम्मेदारी है परन्तु दुर्भाग्यपूर्ण  बात है कि उन्हें शिक्षा का महत्व बस तभी समझ में आता है जब चुनावी सरगर्मी  शुरू होने वाली हो । वोट पाने और किये वादे भूल जाने की परंपरा आज शायद हिंदुस्तान की सियासत का अहम पहलू हो चुका है । 'शिक्षा 'वास्तव में एक ऐसा चुनावी जुमला बन कर उभरा है जिसकी पहुँच सिर्फ और सिर्फ सत्ता के गलियारे तक है ना कि वास्तविक धरातल पर ।
राजनेताओं को देश की शिक्षा व्यवस्था से क्या फर्क पड़ना है क्योंकि ज्यादातर ने खुद के बच्चों को विदेशों में पढ़ाई करवाई है । विडम्बना देखिये कथनी  यहाँ की और करनी कहीं और की ।


शिक्षा व्यवस्था के हालात की बदसूरती इसी बात से पता चलती है कि शायद नेताओं को देश की खस्ताहाल  शिक्षा व्यवस्था पर पूरा यकीन है तभी तो चुनाव ख़त्म होने के बाद 'शिक्षा 'शब्द भी भूल जाते हैं । आज हमारे देश में सरकारी स्कूलों की हालत किसी से छुपी नहीं है ,कोई भी परिवार या पिता जो अपने बच्चों के उत्तम भविष्य की कामना करता है वो कभी उन्हें सरकारी स्कूलों में नहीं भेजेगा । कारण  स्पष्ट है बेपटरी शिक्षा और ढुलमुल शिक्षण । प्राइवेट स्कूल आज पहली और संभवतः आखिरी पसंद बन चुके हैं  चाहे दुगुनी मेहनत करके फीस क्यूँ ना जुटानी पड़े ।
हर साल १२वी  परीक्षा पास करके लाखों  संख्या में विद्यार्थी निकलते हैं ,जिनके लिए कॉलेजो और विश्वविद्यालयों में पर्याप्त सीटों का अभाव रहता है । प्रति सीट लगभग २०-३० विद्यार्थी आवेदन करते हैं ऐसे में ज्यादातर बच्चे उन प्राइवेट कॉलेजों की तरफ रुख करने को मज़बूर होते हैं जहाँ उनसे मोटी फीस वसूली जाती है और पढाई की गुणवत्ता की चर्चा ना ही करें तो बेहतर ।
हर किसी को सरकारी कॉलेजों ,विश्वविद्यालयों और सरकारी नौकरी  चाहिए पर सरकारी स्कूलों की उपेक्षा की कीमत पर । देश में प्रमुख शोध संस्थाएं हैं जैसे ISRO, SLRO, DRDO इत्यादि परन्तु 'ब्रेन ड्रेन 'की समस्या की शिकार । फलस्वरूप शोध की धीमी गति हमें आज भी अमेरिका ,रूस ,फ्रांस ,जापान,चीन जैसे देशों की तुलना में पीछे रखती है । भारत सरकार ने इस गंभीर समस्या को भांपते हुए हाल ही में कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं जिनमें सबसे प्रमुख है देश में नवीन और कम समय में गुणवत्तापूर्ण शोध कार्य को बढ़ावा देना । माननीय उच्च न्यायालय ने भी सरकारी स्कूलों में सरकारी अफसरों के बच्चों की पढ़ाई जैसे आदेश देकर शिक्षा के स्तर को बढ़ाने की कोशिश की है क्यूकी अफसरों के बच्चे जब यहाँ पढ़ेंगे तो अवश्य ही व्यवस्था दुरुस्त होगी और उत्तम शिक्षा सभी को प्राप्त हो सकेगी, जिससे ना केवल उस विद्यार्थी के परिवार का  बल्कि पूरे देश का विकास होग़ा और शिक्षा मात्र एक शब्द से बढ़कर उन्नति का शब्दकोश भी बनेगी ।

*बी.एस.सी.(प्रथम वर्ष )
हरिश्चंद्र पी.जी.कॉलेज

Tuesday, October 20, 2015

 भारत -चीन युद्ध :क्या सच ,क्या झूठ 

                                                                                              -आलोक रंजन*

भारत को ब्रिटिश शासन से आजाद हुए अभी 15 साल ही हुए थे कि भारत पर अचानक संकट का पहाड़ टूट पड़ा । अभी तो देश खड़ा भी नहीं हो पाया था,,,,भारतीय सेना अभी जंग के लिए तैयार नहीं थी कि चीन ने भारत की कमजोरी का फायदा उठा कर आक्रमण कर दिया । वह मनहूस दिन था २० अक्टूबर १९६२ ।  मानो ऐसा लगा कि जिस प्रेमिका को कोई प्रेमी दिल - ओ - जान से चाहता हो आज  उसी  प्रेमिका ने प्रेमी के पीठ पे छूरा भोंक दिया हो । हिंदी -चीनी भाई भाई का दिल जाने क्यूँ धड़कना बन्द हो गया । एक तरफ युद्ध में भारत के १२००० जांबाज़ सैनिक थे तो वहीँ दूसरी ओर कहाँ वो चीन के ८०००० सैनिक। .......  जिसका परिणाम  कभी ना भूलने वाली भारत की अपमानजनक हार ।
खैर ,.... छोडिये साहब !मगर कल तक अपना भाई अचानक जान का दुश्मन क्यों बन बैठा ?इसके पीछे कारण क्या है ?आखिर क्यूँ चीन ने भारत पर हमला किया ?एक नयी किताब में दावा किया गया है की 'peoples republic of china 'के संस्थापक माओत्से तुंग ने  १९६२ में भारत पर हमला पंडित नेहरू को अपमानित करने के लिए किया था ,जो तीसरी दुनिया के नेता के रूप में उभर रहे थे । वहीँ दूसरी तरफ C.I.A.के पूर्व अधिकारी ने अपनी किताब 'J.F.K.'(ज़ फॉरगॉटन क्राइसिस )में लिखा है कि -"भारत द्वारा फॉरवर्ड पालिसी लागू करने से सितम्बर १९६२ में चीन भड़क गया था ।
....... रे काका जी ,लगता है कि एक भाई को दूसरे भाई की उन्नति देखी नहीं गयी । मुझको तो ये कहावत भी याद आ रही कि "भाई जैसा दोस्त और भाई जैसा दुश्मन कभी ना मिलेगा । अच्छा तो आगे चलिए साहब !.... सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी  अखबार 'ग्लोबल टाइम्स 'ने वेब संस्करण में लिखा है कि वर्ष १९६२ का युद्ध पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू जी को झटका देकर अमेरिका और पूर्व सोवियत संघ के प्रभाव में प्रभाव ज़माने के लिए था । इसने दावा किया कि उस वक़्त चीन के नेता माओत्से तुंग के गुस्से का असली निशाना वाशिंगटन और मास्को थे । …भैया जी !जब बीजिंग का मुक़ाबला वाशिंगटन और मास्को से था तो क्या नयी दिल्ली से उस वक़्त टेस्ट क्रिकेट चल रहा था । कुछ और आगे चलिए साहब क्या पता असली वजह पता चल जाए। …
"चीन जीता लेकिन वह कभी भी भारत -चीन युद्ध नहीं चाहता था "शीर्षक से लिखे गए लेख में कहा गया है कि "५० वर्ष पहले जब चीन घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तमाम समस्याओं दो -चार हो रहा था तो अमेरिका और सोवियत संघ के उकसावे में आकर नेहरू प्रशासन ने वर्ष १९५९ से १९६२ बीच भारत -चीन सीमा पर और समस्याएं खड़ी कर दी ।  .......... और बात यहीं ख़त्म नहीं हो जाती "चाइनीस एकेडेमी ऑफ़ सोशल साइंसेज "में 'सेंटर ऑफ़ वर्ल्ड पॉलिटिक्स 'के सहायक महासचिव होन्ग युआन द्वारा लिखे इस लेख में  है कि युद्ध भारत के साथ शांति स्थापित करने के लिए लड़ा गया था ।

वाह भाई वाह !!!!क्या खूब कहा है आपने किसी को चोट इसलिए पहुंचायी कि मरहम लगाने का मन कर रहा था ।  रहने दो भाई साहब! तहरीर देना बंद करो ,अब चालाकी नहीं चलने वाली ।

*बी.ए. (प्रथम वर्ष)
मास कम्यूनिकेशन 
हरिश्चंद्र पी, जी.कॉलेज

Tuesday, October 13, 2015

डेंगू ,आध्यात्म और लेखक 

 कहते हैं ,डेंगू अपनी मौलिक बीमारी नहीं है । बाहर से आयी है । फ्लू भी सुना है ,जापान से आया है । सांस्कृतिक आदान-प्रदान की संधियाँ होती हैं ,मगर रोग आ जाते हैं । बीमारियॉं अन्तर्राष्ट्रीय हो गयी हैं । हम बाहर की बीमारियॉं ग्रहण करने के लिए बहुत तत्पर रहते हैं। हमने अपनी कोई बीमारी किसी को दी हो, मैं नहीं जानता। निर्यात अपना कमजोर है -सामान का हो ,चाहे बीमारी का । सुना है ,भारतीय गांजा और भांग पश्चिम में बहुत पसंद किये जाते हैं । ये धार्मिक नशे हैं । नशों के बदले हम बीमारी लेते हैं । पश्चिम को और नशा चाहिये ,पूर्व को और बीमारी चाहिए । ज्यों -ज्यों पश्चिम का नशा बढ़ता जाता है ,त्यों -त्यों इधर ज्यादा बीमारी भी बढ़ती जाती है । अपनी अर्थ व्यवस्था को डेंगू हो चुका है । लेटती है तो उठा नहीं जाता । बिठा दो, तो लुढ़क जाती है । पूछता हूँ =माता जी क्या हो गया ?कहती है =बेटा ,डेंगू हो गया है । बाहर से 'इन्फेक्शन 'आया था । मेरे बेटे रुपये को भी डेंगू हो गया था । कितना दुबला गया बेचारा ।

यह 'इन्फेक्शन 'फैलता कौन है ?कहते हैं ,आम तौर पर मच्छर इसे फैलाते हैं । मच्छरों को बीमारी ढोने के सिवा कोई काम नहीं । शेर ,हाथी या बैल कोई 'इन्फेक्शन'नहीं ढोते । मच्छरों से सावधान रहना चाहिये । वे अब अंतर्राष्ट्रीय सम्पर्क वाले हो गये हैं । जो बीमारी वाली जगहें हैं ,वहाँ अपने यहाँ से मच्छरों को नहीं जाने देना चाहिये । वे बीमारी ले आयेंगे । भारत सरकार को इसका विशेष ध्यान रखना चाहिये । बीमारी देने वाले देशों को अपने यहाँ से मच्छर न भेजा करें । पहले की असावधानी का नतीजा भुगत रहे हैं । डेंगू लग गया अर्थ -व्यवस्था को ।

(लेखक को डेंगू हो गया । यह लेख इतना ही लिखा हुआ 8 -10 दिनों तक पड़ा रहा । ) 


=हरिशंकर परसाई 
(कहानी संग्रह 'पगडंडियों का ज़माना 'से साभार )