Wednesday, October 21, 2015

मेरे दिल का कुछ राज़ ……

                                   -आलोक रंजन *


हम दिल में राज़ छुपाये बैठे हैं ,
कुछ उलझे से हैं ,कुछ सुलझे से हैं ।

क्या कहते सागर की ये लहरें ,
कहाँ रहते ,सूरज की ये रोशनी ;
ये तारे इतने दूर हैं क्यूँ ,
क्या करती चाँद की ये चांदनी

ये हवा क्यूँ बहती है सहमी -सहमी
कुछ उलझे से हैं ,कुछ सुलझे से हैं।

हम उनसे यूँ ही करते हैं प्यार ,
करते रहे और करते गये
एक राह पे चलते रहे साथ -साथ
कि ....  अचानक वो हमसे बिछड़ गये ;

अबतक इंतज़ार करता हूँ क्यूँ ,उसी मोड़ पे ;
कुछ उलझे से हैं ,कुछ सुलझे से हैं।

हम दिल में राज़ छुपाये बैठे हैं ,
कुछ उलझे से हैं ,कुछ सुलझे से हैं ।

*हरिश्चंद्र पी.जी.कॉलेज ।

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