डेंगू ,आध्यात्म और लेखक
कहते हैं ,डेंगू अपनी मौलिक बीमारी नहीं है । बाहर से आयी है । फ्लू भी सुना है ,जापान से आया है । सांस्कृतिक आदान-प्रदान की संधियाँ होती हैं ,मगर रोग आ जाते हैं । बीमारियॉं अन्तर्राष्ट्रीय हो गयी हैं । हम बाहर की बीमारियॉं ग्रहण करने के लिए बहुत तत्पर रहते हैं। हमने अपनी कोई बीमारी किसी को दी हो, मैं नहीं जानता। निर्यात अपना कमजोर है -सामान का हो ,चाहे बीमारी का । सुना है ,भारतीय गांजा और भांग पश्चिम में बहुत पसंद किये जाते हैं । ये धार्मिक नशे हैं । नशों के बदले हम बीमारी लेते हैं । पश्चिम को और नशा चाहिये ,पूर्व को और बीमारी चाहिए । ज्यों -ज्यों पश्चिम का नशा बढ़ता जाता है ,त्यों -त्यों इधर ज्यादा बीमारी भी बढ़ती जाती है । अपनी अर्थ व्यवस्था को डेंगू हो चुका है । लेटती है तो उठा नहीं जाता । बिठा दो, तो लुढ़क जाती है । पूछता हूँ =माता जी क्या हो गया ?कहती है =बेटा ,डेंगू हो गया है । बाहर से 'इन्फेक्शन 'आया था । मेरे बेटे रुपये को भी डेंगू हो गया था । कितना दुबला गया बेचारा ।यह 'इन्फेक्शन 'फैलता कौन है ?कहते हैं ,आम तौर पर मच्छर इसे फैलाते हैं । मच्छरों को बीमारी ढोने के सिवा कोई काम नहीं । शेर ,हाथी या बैल कोई 'इन्फेक्शन'नहीं ढोते । मच्छरों से सावधान रहना चाहिये । वे अब अंतर्राष्ट्रीय सम्पर्क वाले हो गये हैं । जो बीमारी वाली जगहें हैं ,वहाँ अपने यहाँ से मच्छरों को नहीं जाने देना चाहिये । वे बीमारी ले आयेंगे । भारत सरकार को इसका विशेष ध्यान रखना चाहिये । बीमारी देने वाले देशों को अपने यहाँ से मच्छर न भेजा करें । पहले की असावधानी का नतीजा भुगत रहे हैं । डेंगू लग गया अर्थ -व्यवस्था को ।
(लेखक को डेंगू हो गया । यह लेख इतना ही लिखा हुआ 8 -10 दिनों तक पड़ा रहा । )
=हरिशंकर परसाई
(कहानी संग्रह 'पगडंडियों का ज़माना 'से साभार )
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