शिक्षा व्यवस्था :सियासी जुमलेबाजी या उन्नति का शब्दकोश
-अनुराधा प्रजापति *
यूँ तो भारत अपनी संस्कृति ,साहित्य और आध्यात्मिक दर्शन को लेकर दुनिया भर में मशहूर है । दुनिया का सबसे बड़ा संविधान और अब जल्द ही सबसे अधिक जनसँख्या वाला देश भी जिसमे आधी से अधिक आबादी युवाओं की है । उत्तम शिक्षा ही देश और लोगों के विकास के लिए एकमात्र उचित और प्रभावशाली माध्यम है । दरअसल ,संवैधानिक पदों पर आसीन जन नायक और नायिकाओं पर न केवल शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त बल्कि अद्यतन भी करने की जिम्मेदारी है परन्तु दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि उन्हें शिक्षा का महत्व बस तभी समझ में आता है जब चुनावी सरगर्मी शुरू होने वाली हो । वोट पाने और किये वादे भूल जाने की परंपरा आज शायद हिंदुस्तान की सियासत का अहम पहलू हो चुका है । 'शिक्षा 'वास्तव में एक ऐसा चुनावी जुमला बन कर उभरा है जिसकी पहुँच सिर्फ और सिर्फ सत्ता के गलियारे तक है ना कि वास्तविक धरातल पर ।राजनेताओं को देश की शिक्षा व्यवस्था से क्या फर्क पड़ना है क्योंकि ज्यादातर ने खुद के बच्चों को विदेशों में पढ़ाई करवाई है । विडम्बना देखिये कथनी यहाँ की और करनी कहीं और की ।
शिक्षा व्यवस्था के हालात की बदसूरती इसी बात से पता चलती है कि शायद नेताओं को देश की खस्ताहाल शिक्षा व्यवस्था पर पूरा यकीन है तभी तो चुनाव ख़त्म होने के बाद 'शिक्षा 'शब्द भी भूल जाते हैं । आज हमारे देश में सरकारी स्कूलों की हालत किसी से छुपी नहीं है ,कोई भी परिवार या पिता जो अपने बच्चों के उत्तम भविष्य की कामना करता है वो कभी उन्हें सरकारी स्कूलों में नहीं भेजेगा । कारण स्पष्ट है बेपटरी शिक्षा और ढुलमुल शिक्षण । प्राइवेट स्कूल आज पहली और संभवतः आखिरी पसंद बन चुके हैं चाहे दुगुनी मेहनत करके फीस क्यूँ ना जुटानी पड़े ।
हर साल १२वी परीक्षा पास करके लाखों संख्या में विद्यार्थी निकलते हैं ,जिनके लिए कॉलेजो और विश्वविद्यालयों में पर्याप्त सीटों का अभाव रहता है । प्रति सीट लगभग २०-३० विद्यार्थी आवेदन करते हैं ऐसे में ज्यादातर बच्चे उन प्राइवेट कॉलेजों की तरफ रुख करने को मज़बूर होते हैं जहाँ उनसे मोटी फीस वसूली जाती है और पढाई की गुणवत्ता की चर्चा ना ही करें तो बेहतर ।
हर किसी को सरकारी कॉलेजों ,विश्वविद्यालयों और सरकारी नौकरी चाहिए पर सरकारी स्कूलों की उपेक्षा की कीमत पर । देश में प्रमुख शोध संस्थाएं हैं जैसे ISRO, SLRO, DRDO इत्यादि परन्तु 'ब्रेन ड्रेन 'की समस्या की शिकार । फलस्वरूप शोध की धीमी गति हमें आज भी अमेरिका ,रूस ,फ्रांस ,जापान,चीन जैसे देशों की तुलना में पीछे रखती है । भारत सरकार ने इस गंभीर समस्या को भांपते हुए हाल ही में कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं जिनमें सबसे प्रमुख है देश में नवीन और कम समय में गुणवत्तापूर्ण शोध कार्य को बढ़ावा देना । माननीय उच्च न्यायालय ने भी सरकारी स्कूलों में सरकारी अफसरों के बच्चों की पढ़ाई जैसे आदेश देकर शिक्षा के स्तर को बढ़ाने की कोशिश की है क्यूकी अफसरों के बच्चे जब यहाँ पढ़ेंगे तो अवश्य ही व्यवस्था दुरुस्त होगी और उत्तम शिक्षा सभी को प्राप्त हो सकेगी, जिससे ना केवल उस विद्यार्थी के परिवार का बल्कि पूरे देश का विकास होग़ा और शिक्षा मात्र एक शब्द से बढ़कर उन्नति का शब्दकोश भी बनेगी ।
*बी.एस.सी.(प्रथम वर्ष )
हरिश्चंद्र पी.जी.कॉलेज
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