सायरन क्यों ?
आज की सामाजिक सांस्कृतिक विसंगतियों पर रचनात्मक प्रहार के लिए, यानी शोषण , अन्याय और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आम आदमी के हितों के लिए प्रतिबद्ध ।वास्तव में सायरन वैचारिक स्वतंत्रता का हिमायती है । मुद्दों ,कृतियों ,खोज ,अभिमत के साथ साथ सायरन व्यक्तिगत सोच को आवाज देने के लिए प्रतिबद्ध है ।
'सायरन' गुट निरपेक्ष है इसलिए निष्पक्ष और निर्भीक है। विकासशील तो है ही। मठाधीशों के चंगुल से मुक्त है इसलिए किसी की महत्वाकांक्षा की आपूर्ति का जरिया नहीं है।
आज का हर रचनाकार जनवादी समाजवादी हो गया है । सामाजिक -सांस्कृतिक विसंगतियों को न पकड़ सकने के कारण या सुविधाभोगी होने की वजह से मूलधारा से कट गया है । उसका लेखन बौद्धिक ऐय्याशी का उदाहरण बनता जा रहा है । हर पत्रिका, पुस्तक, लेखक के कुछ 'अपने लोग' हैं। ये 'अपने लोग' न केवल साहित्य बल्कि सामाजिक आयाम को भी संकुचित करने पर तुले हैं ।सायरन ऐसे लोगों के विवेक के शुद्धिकरण के लिए कृतसंकल्प है । इसी में श्रम की सार्थकता समझी जायेगी ।
धन्यवाद !!!
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